भाषाई सीमा से परे भक्ति की ओढ़

भाषाई सीमा से परे भक्ति की ओढ़

(अनुराग तागड़े)
इंदौर। भक्ति में लगे सुर आत्मा को तृप्त जब करने लगे तब भाषा कही पर भी आड़े नहीं आती बल्कि अपने प्रभु अपने विठ्ठल के प्रति भक्ति की ओढ़ अपने आप महसूस होने लगती है। सानंद न्यास एवं पंचम निषाद मुंबई द्वारा आषाढी एकादशी के उपलक्ष्य में यूसीसी आॅडिटोरियम में आयोजित बोलावा विठ्ठल कार्यक्रम भक्ति रस में डूबा था और सबसे आश्चर्य का विषय यह था कि तीनों ही कलाकार मराठीभाषी नहीं थे और तो और कन्नड भाषा में विठ्ठल की भक्ति में लगे सुरों का आनंद मराठीभाषियों ने लिया।
शहर में रंजनी और गायत्री दोनो गायिकाओं की यह संभवत: पहली प्रस्तुति थी और यकीन मानिए इन दोनों गायिकाओं ने अपने अभंग प्रस्तुतियों के माध्यम से श्रोताओं को न केवल भक्तिरस में भिगोया बल्कि अपनी विशिष्ट प्रस्तुतिकरण से श्रोताओं को अपना मुरीद बना लिया।
कार्यक्रम की शुरूआत विठ्ठल के गजर से हुई जिसमें पहले नामस्मरण किया जाता है और तीनों ही कलाकारों ने एक साथ नामस्मरण किया। इसके पश्चात मंच संभाला रंजनी और गायत्री ने। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में गायन सीखी इन बहनों ने सुरावट और मिठास के साथ जब रुप पाहता लोचनी अभंग की प्रस्तुति दी तब दर्शक विस्मृत होकर इन्हें सुनने लगे क्योंकि सुरों का लगाव और जिस प्रकार से दोनों का आपस में तालमेल अद्भुत था। एक दुसरे को सम्मान देते हुए दोनों ही कलाकार अपनी अपनी खूबियों को प्रस्तुत कर रहे थे। दोनों ही सुरों की सही जगह को लेकर बेहद सजग रही और यही कारण था कि प्रस्तुति दमदार रही। कशी जाऊ मी वृंदावनात की प्रस्तुति भी शानदार रही और श्रोताओं ने इसकी खूब तारीफ की। बोलावा विठ्ठल पहावा विठ्ठल इस अभंग की प्रस्तुति में जहां गंभीरता थी वही तार सप्तक तक आवाज की रेंज है इस बात का एहसास कलाकारों ने करवा दिया। विठोबा चला मंदिरात की प्रस्तुति के बाद पंढरी चे भूत मोठे की प्रस्तुति के बाद वंस मोर की मांग श्रोताओं ने की और दोनों कलाकारों ने श्रोताओं का मान रखा। दोनों की प्रस्तुति के समापन के पश्चात सभी दर्शकों ने अपनी जगह खड़े होकर रंजनी और गायत्री की दिल खोलकर तारीफ की।
इसके पश्चात ख्यात गायक जयतीर्थ मेवुंडी ने मंच संभाला। जयतीर्थ जी की गिनती देश के ख्यातनाम कलाकारों में होती है और जिस प्रकार से जयतीर्थ जी ने आलापी आरंभ की सही मायने में यूसीसी आॅडिटोरियम में एक ऐसा वातावरण निर्मित हो गया जिसमें सुरों की गंभीरता का एहसास हो रहा था। जयतीर्थ जी जब भी इंदौर आते है तब अलग मिजाज में नजर आते है और बोलावा विठ्ठल कार्यक्रम में अलग ही मूड में नजर आए उन्होंने अपनी गायकी को श्रोताओं के अनुरुप ढाला और पुरिया धनाश्री राग में स्वरचित अभंग विसावा विठ्ठल की प्रस्तुति दी। जयतीर्थ जी ने गले की फिरत के साथ लय लागी लय लागी अभंग की प्रस्तुति दी। इसके पश्चात दक्षिण के ख्यात संत जगन्नाथ दास रचित कन्नड़ भजन की प्रस्तुति दी। इसकी शुरूआत संगत कलाकारों ने पहले की और पश्चात जयतीर्थ जी ने प्रस्तुति दी जो की बेहद आकर्षक थी। इसी भजन में उन्होंने माझे माहेर पंढरी चे प्रस्तुति किया तब श्रोता भावविभोर हो गए। सौभाग्य लक्ष्मी की प्रस्तुति के पूर्व की आलापचारी ने यह साबित कर दिया कि जयतीर्थ जी का गला कितना रियाजी है।
सांई बँकर की बात ही अलग
भक्ति रस में डूबे कार्यक्रम में अगर साथ देने वाले कलाकार अपने अनुभव का निचोड़ डालते हैं तब निश्चित रुप से कार्यक्रम उभर कर सामने आता है। बोलावा विठ्ठल कार्यक्रम में ख्यात तबला कलाकार सांई बँकर ने सधी हुई संगत से यह साबित कर दिया। वहीं हारमोनियम पर आदित्य ओक व बांसुरी पर एस आकाश ने भी श्रोताओं की खूब दाद ली। इसके अलावा पखावज पर प्रकाश शेजवाल, साईड रिदम सूर्यकांत सुर्वे ने भी खूब शानदार संगत की।
कार्यक्रम का शुभारंभ भुवनेश व शोभा शास्त्री ने किया। कलाकारों का स्वागत पंचम निषाद के शशि व्यास, ज्योति व्यास, सारंग व्यास व सानंद के जयंत भिसे, सुधाकर काळे, सुभाष देशपांडे ने किया।